कम लागत और ज्यादा मुनाफे ने किसानों को मक्के की खेती की ओर मोड़ा
फर्रुखाबाद/कन्नौज| उत्तर प्रदेश के 'आलू बेल्ट' कहे जाने वाले क्षेत्रों में इन दिनों चिलचिलाती धूप के बावजूद खेतों में हरियाली की चादर बिछी हुई है। यह रौनक मक्के की फसल की है, जो आलू की खेती में हुए नुकसान से परेशान किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौटा रही है। किसानों का मानना है कि मक्के की यह पैदावार न केवल उनके घाटे की भरपाई करेगी, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से समृद्ध भी बनाएगी। खास बात यह है कि इस फसल में लागत बेहद कम आ रही है।
फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा और कानपुर देहात जैसे जिलों में जहाँ आलू ने किसानों की उम्मीदों को झटका दिया था, वहीं मक्के की लहलहाती बालियों ने उन्हें नई हिम्मत दी है।
आलू के बाद मक्के ने संभाली कमान
राजेपुर के किसान राजित सिंह बताते हैं कि आलू की खुदाई खत्म होते ही उन्होंने तुरंत मक्के की बुवाई कर दी। आलू के खेत में पहले से मौजूद उर्वरकों के कारण अतिरिक्त खाद की जरूरत नहीं पड़ी। इसी तरह, कमालगंज के वीरेंद्र शुक्ला और कन्नौज के हरिशंकर लोधी भी मक्के की अच्छी बालियों को देखकर उत्साहित हैं। वे बताते हैं कि इस बार समय पर हुई हल्की बारिश ने सिंचाई का खर्च भी आधा कर दिया है।
सरकारी प्रोत्साहन से बढ़ा रकबा
छिबरामऊ के किसानों के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिछले वर्ष के हवाई सर्वे और विभागीय अधिकारियों के प्रोत्साहन के बाद मक्के की खेती के प्रति रुझान बढ़ा है। 'त्वरित मक्का विकास योजना' के तहत किसानों को हाइब्रिड और देसी बीजों पर 50% तक का अनुदान दिया जा रहा है। प्रदर्शन कार्यक्रमों के माध्यम से भी किसानों को प्रति एकड़ भारी आर्थिक मदद मिल रही है।
मक्के की खेती का आर्थिक गणित
रिटायर्ड अध्यापक और किसान महेश सिंह बताते हैं कि आलू के बाद मक्के की खेती 'कम लागत, ज्यादा मुनाफा' का सौदा है।
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लागत: प्रति बीघा करीब 3 से 6 हजार रुपये।
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मुनाफा: प्रति बीघा लगभग 15 से 20 हजार रुपये।
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बाजार: कच्चा मक्का 20-25 रुपये प्रति किलो बिक जाता है। जो फसल बारिश से प्रभावित होकर काली पड़ जाती है, उसे एथेनॉल उत्पादन और शराब फैक्ट्रियों में भेज दिया जाता है।
गांवों तक पहुँच रहे खरीदार
अब किसानों को उपज बेचने के लिए भटकना नहीं पड़ता। खरीदार सीधे गांवों में पहुँच रहे हैं। मक्के की मांग एथेनॉल उत्पादन, पशु चारा और पोल्ट्री फीड (मुर्गी पालन) उद्योग में बहुत अधिक है। मोहम्मदाबाद के किसान सुनील सिंह बताते हैं कि मक्के से होने वाली अतिरिक्त आय ने उन्हें इतना संबल दिया है कि वे अपने बच्चों को कानपुर जैसे शहरों में उच्च शिक्षा दिला पा रहे हैं।
रिकॉर्ड उत्पादन की ओर बढ़ता कदम
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जायद सीजन में मक्के का क्षेत्रफल लक्ष्य से कहीं अधिक पहुँच गया है। वर्ष 2024-25 के लिए निर्धारित 8.65 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य पार कर अब यह 10.85 लाख हेक्टेयर तक पहुँच चुका है। उत्पादन में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो 2027-28 के अनुमानित लक्ष्य को अभी ही छू रही है।
जायद सीजन में बढ़ता ग्राफ (क्षेत्रफल लाख हेक्टेयर में):
| वर्ष | क्षेत्रफल | उत्पादन (लाख मीट्रिक टन) |
| 2021-22 | 0.48 | 1.38 |
| 2023-24 | 3.03 | 10.62 |
| 2024-25 | 5.13 | 17.82 |
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