सिंहस्थ को लेकर कोर्ट का बड़ा आदेश, शिप्रा किनारे रिसोर्ट-बिजनेस पर बैन
इन्दौर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन की जीवनदायिनी शिप्रा नदी के संरक्षण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि नदी के किनारों पर किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि को अनुमति नहीं दी जाएगी। न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए नदी तट से 100 से 200 मीटर के दायरे में बन रहे रिसॉर्ट्स के निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह पूरा मामला उज्जैन के स्थानीय निवासी सत्यनारायण द्वारा प्रस्तुत की गई एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें मास्टर प्लान के नियमों को ताक पर रखकर नदी क्षेत्र में हो रहे बड़े निर्माण कार्यों को चुनौती दी गई है।
प्रशासन को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत ने अवैध निर्माणों की वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इससे पूर्व की कार्यवाही में सरकार की ओर से बताया गया था कि कुछ अनधिकृत ढांचों को ध्वस्त किया जा चुका है और बाकी को कानूनी नोटिस जारी किए गए हैं। इसी कड़ी में कोर्ट ने उज्जैन नगर निगम और राज्य सरकार को सख्त हिदायत दी थी कि वे 200 मीटर के दायरे में मौजूद तमाम अवैध कब्जों पर की गई कार्रवाई की समयबद्ध रिपोर्ट प्रस्तुत करें। हालिया सुनवाई में नगर निगम के अधिवक्ताओं ने कार्यप्रगति की जानकारी देते हुए यह दावा किया है कि नदी क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करने का अभियान निरंतर संचालित किया जा रहा है।
रिसॉर्ट्स निर्माण पर रोक और आगामी सुनवाई
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मास्टर प्लान के प्रावधानों का उल्लंघन कर प्रस्तावित रिसॉर्ट्स के काम को बीच में ही रुकवा दिया है। उच्च न्यायालय ने शासन और निगम द्वारा दिए गए जवाबों पर याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। अब इस पूरे प्रकरण की अगली सुनवाई आगामी 15 जून को निर्धारित की गई है, जिसमें याचिकाकर्ता को सरकार के दावों पर अपना प्रतिउत्तर पेश करना होगा। तब तक न्यायालय के आदेशानुसार नदी के संवेदनशील दायरे में किसी भी नए व्यावसायिक निर्माण की अनुमति नहीं रहेगी, जिससे शिप्रा नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बिगड़ने से बचाया जा सके।
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