चैत्र त्रयोदशी पर जसोलधाम में आस्था का महासागर, भक्तों की भारी भीड़
बालोतरा। राजस्थान के बालोतरा क्षेत्र की पवित्र धरती पर स्थित जसोलधाम में चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भक्ति और श्रद्धा का ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो हर किसी के मन को छू गया। भोर होने से पहले ही मंगला आरती की मधुर ध्वनि के साथ मंदिर परिसर भक्तिरस में डूब गया। सूरज की पहली किरण फूटने से पहले ही हज़ारों श्रद्धालुओं के कदम जसोलधाम की ओर बढ़ चले और देखते ही देखते पूरा परिसर 'जय माँ जसोल' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
जयकारों ने आध्यात्मिक ऊंचाई पर पहुंचाया
श्रद्धालु पूरी आस्था और अनुशासन के साथ लंबी कतारों में खड़े होकर श्री राणीसा भटियाणीसा समेत अन्य देवी-देवताओं के दर्शन को आतुर दिखे। मंदिर में गूंजती घंटियों की टंकार, भजन-कीर्तन की स्वर लहरियां और भक्तों के गगनभेदी जयकारों ने पूरे माहौल को एक अलग ही आध्यात्मिक ऊंचाई पर पहुंचा दिया।
हर चेहरे पर झलकती है श्रद्धा
इस पावन अवसर पर केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर के कोने-कोने से श्रद्धालु माँ के दरबार में हाज़िरी देने पहुंचे। कई घरों से नवजात शिशुओं को पहली बार माँ के चरणों में लाया गया, तो वहीं नए जीवन की शुरुआत करने वाले नवविवाहित जोड़े सुख-समृद्धि और मंगलमय दांपत्य जीवन की दुआ लेकर माँ के द्वार पर आए। हर चेहरे पर झलकती श्रद्धा और आंखों में दिखता विश्वास इस आयोजन की सबसे बड़ी पहचान रही।
सीसीटीवी कैमरों से पूरे परिसर में कड़ी नजर रखी जाती थी
विशाल जनसैलाब को सुव्यवस्थित रूप से संभालने के लिए मंदिर संस्थान ने पहले से ही व्यापक तैयारियां कर रखी थीं। दर्शन को निर्बाध बनाए रखने के लिए बहुस्तरीय कतार प्रणाली अपनाई गई। प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मियों की चौकस तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी कैमरों से पूरे परिसर पर कड़ी नज़र रखी गई। पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम के ज़रिए श्रद्धालुओं को लगातार ज़रूरी दिशा-निर्देश दिए जाते रहे, जिससे भारी भीड़ के बावजूद व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रित रही। पेयजल, स्वच्छता, पार्किंग और यातायात प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया। दिव्यांग और वृद्ध श्रद्धालुओं के लिए अलग सहायता केंद्र बनाए गए, ताकि वे बिना किसी परेशानी के माँ के दर्शन कर सकें।
भारतीय संस्कृति की जीती-जागती तस्वीर पेश की
धार्मिक उत्सव के साथ-साथ सेवा और समर्पण की भी एक अनोखी मिसाल यहां देखने को मिली। अन्नपूर्णा प्रसादम् और छप्पन भोग का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें हज़ारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर स्वयं को कृतार्थ महसूस किया। इस पुण्य सेवा कार्य का लाभ आकड़ली निवासी ताजाराम और मूलाराम परिवार को प्राप्त हुआ। सनातन परंपरा के अनुसार कन्या पूजन का कार्यक्रम भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। कन्याओं को माँ का साक्षात् स्वरूप मानते हुए उनका पूजन, चरण वंदन और भोजन-दक्षिणा से सम्मान किया गया। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की जीती-जागती तस्वीर पेश कर रहा था।
दोल-नगाड़ों की थाप से कार्यक्रम में फूंकी जान
शाम ढलते ही भव्य भजन संध्या और जागरण का आयोजन हुआ, जिसने रात के अंधेरे में भी भक्ति की रोशनी बिखेर दी। गैर नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पुष्कर से पधारे नगारची कलाकारों के पारंपरिक नगाड़ा वादन ने वातावरण में ऊर्जा भर दी, तो बाड़मेर के हड़वा क्षेत्र से आए भजन गायकों ने अपनी सुरीली आवाज़ से देर रात तक श्रद्धालुओं को भक्ति में डुबोए रखा। स्थानीय दमामी कलाकारों ने भी ढोल-नगाड़ों की थाप से कार्यक्रम में जान फूंक दी।
दर्शन का लाइव प्रसारण किया गया
इस बार के आयोजन में आधुनिक तकनीक का उपयोग इसे और खास बना गया। मंदिर संस्थान द्वारा आरती और दर्शन का लाइव प्रसारण किया गया, जिससे देश-विदेश में बैठे लाखों श्रद्धालु अपने घरों में रहकर ही माँ जसोल के दर्शन का पुण्य लाभ उठा सके। आस्था और तकनीक के इस अनूठे मेल को लोगों ने खूब सराहा।पूरे कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने जी-जान लगाकर सेवा की, जबकि स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग के सहयोग से यह विशाल आयोजन सुरक्षित और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
मंदिर संस्थान के प्रवक्ता कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने बताया कि जसोलधाम में श्रद्धालुओं की आमद साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। इसी को देखते हुए भविष्य में और अधिक आधुनिक सुविधाएं विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है, ताकि हर श्रद्धालु को बेहतर अनुभव मिल सके। यूं कहें तो चैत्र त्रयोदशी का यह पवित्र पर्व जसोलधाम में भक्ति, सेवा, संस्कृति और आधुनिकता के एक अविस्मरणीय संगम के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
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