रुक जाता है शिव-शक्ति का गठबंधन, उतारा जाता है पंचशुल! महाशिवरात्रि से पहले बैद्यनाथ धाम में अनोखी परंपरा
झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथधाम देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक अत्यंत पवित्र तीर्थ है. मान्यता है कि यहां स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान रहते हैं. यही कारण है कि इस धाम की महिमा और परंपराएं अन्य ज्योतिर्लिंगों से कुछ अलग और विशेष मानी जाती हैं. यहां की कई परंपराएं ऐसी हैं जो शायद ही किसी अन्य ज्योतिर्लिंग में देखने को मिलें. जैसे गठबंधन, थापा और पंचशूल की अनोखी परंपरा. बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर की एक खास बात यह है कि यहां केवल मुख्य मंदिर ही नहीं, बल्कि कुल 22 मंदिर स्थापित हैं. इन सभी मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल की जगह पंचशूल विराजमान है. आम तौर पर शिव मंदिरों में त्रिशूल देखने को मिलता है, लेकिन देवघर में पंचशूल की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो इसे विश्व में अद्वितीय बनाती है.
कल उतारा जाएगा शिखर पर लगे पंचशूल को
पंचशूल को साल में केवल एक बार ही मंदिर के शिखर से उतारा जाता है. महाशिवरात्रि से दो दिन पहले यह विशेष अनुष्ठान किया जाता है. इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी को है, इसलिए 13 फरवरी को पंचशूल उतारा जाएगा. इससे पहले अन्य मंदिरों के पंचशूल भी उतारकर मंदिर कार्यालय में सुरक्षित रखे जा चुके हैं. निर्धारित समय पर मंदिर के भंडारी द्वारा बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती मंदिर के पंचशूल को विधिपूर्वक उतारा जाएगा. पंचशूल उतरने के बाद मंदिर प्रांगण में एक विशेष आयोजन होता है. जिसमें बाबा और माता पार्वती के पंचशूल का मिलन कराया जाता है. इस पवित्र दृश्य को देखने और पंचशूल का स्पर्श करने के लिए हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं. मान्यता है कि पंचशूल का स्पर्श करने से विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है.
पंचशूल उतरने के साथ ही रुक जायेगी गठबंधन की परम्परा
पंचशूल उतारने के साथ ही बाबा और पार्वती मंदिर का गठबंधन भी कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है. जब महाशिवरात्रि के दिन पुनः विधिवत पूजा-अर्चना के बाद पंचशूल को शिखर पर स्थापित किया जाता है. तभी गठबंधन की परंपरा दोबारा शुरू होती है. इस क्रम में सबसे पहले सरदार पांडा द्वारा गठबंधन अर्पित किया जाता है. यह परंपरा वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है.
क्या महत्व है पंचशूल का
कहा जाता है कि पंचशूल पांच तत्वों पृथ्वी (छिति), जल, अग्नि (पावक), आकाश (गगन) और वायु (समीर) का प्रतीक है. यह सृष्टि के आधारभूत तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है. साथ ही इसे एक दिव्य सुरक्षा कवच भी माना जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि पंचशूल की कृपा से मंदिर परिसर सुरक्षित रहता है. यहां किसी प्रकार की बड़ी प्राकृतिक आपदा नहीं आती है. आस्था, परंपरा और अनोखी मान्यताओं से जुड़ा बाबा बैद्यनाथधाम सचमुच श्रद्धा का अद्भुत केंद्र है, जहां हर वर्ष महाशिवरात्रि पर भक्ति और विश्वास का अनोखा संगम देखने को मिलता है.
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